चुनाव 2019: आजगमढ़ में अखिलेश यादव को बड़ी बढ़त, निरहुआ से तीन गुना ज्यादा वोट

नई दिल्लीः आजमगढ़ लोकसभा सीट के लिए मतगणना ठीक सुबह आठ बजे शुरू हो चुकी है। यहां सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद प्रत्याशी हैं। अखिलेश ने शुरुआती रुझान में ही बड़ी बढ़त बना ली है। दस बजे तक अखिलेश को 5575 वोट मिले थे। भाजपा प्रत्याशी भोजपुरी स्टार निरहुआ को केवल 1637 ही वोट मिले थे। इन दोनों प्रत्याशियों के मतों पर लोगों की निगाहें लगी हुई हैं। 25 से 32 राउंड में पूरी गिनती होगी। आजमगढ़ लोकसभा सीट के लिए शहर के बेलइसा एफसीआई गोदाम में मतगणना हो रही है। विधानसभावार मतगणना के लिए 14-14 टेबल लगाए गए हैं। इसके अलावा एक-एक टेबल आरओ के लिए लगाए गए हैं। आजमगढ़ लोकसभा के मेहनगर विधानसभा में सबसे अधिक 436 बूथों की गणना पूरी करने में 32 राउंड होगी। यहां भी 31 वें राउंड के बाद दो ही बूथों की ईवीएम की गिनती रह जाएगी। 32 वें राउंड में दो बूथों की गिनती होगी।

आजमगढ़ और लालगंज लोकसभा की मतगणना के लिए 140 टोली में 560 कर्मचारियों को तैनात किया गया है। प्रत्येक टोली में एक मतगणना सुपरवाइजर, दो मतगणना सहायक और एक चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी शामिल है। बेइलइसा एफसीआई गोदाम में आजमगढ़ लोकसभा के लिए विधानसभावार 14-14 टेबल लगाए गए हैं। इसी तरह चकवल एफसीआई गोदाम में विधानसभावार 14-14 टेबल लगाए गए हैं। सुबह पहले बैलेट मतपत्रों की गिनती की जाएगी। इसके बाद ईवीएम से वोटों की गिनती शुरू की जाएगी।

आजमगढ़ में कभी किसी लहर का प्रभाव नहीं रहा। चाहे वह जनता लहर हो, राम लहर रहा हो या फिर मोदी लहर। हर चुनाव में यहां के वोटरों ने लहर के विपरीत परिणाम दिया है। 1978 में जब देश में कांग्रेस के खिलाफ लहर थी तब उपचुनाव में कांग्रेस की मोहसिना किदवई को जीत मिली। नब्बे के दशक के अंत में जिस वक्त पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ वीपी सिंह अपने पक्ष में लहर बनाने में कामयाब हुए, जनता दल अौर बीजेपी को बड़ी जीत मिली तब भी यहां जनता दल के प्रत्याशी त्रिपुरारी पूजन सिंह को पराजय मिली अौर बसपा के रामकृष्ण यादव जीते। रामलहर में भी भाजपा का प्रत्याशी जीत नहीं दर्ज करा सका। इसी तरह 2014 के चुनाव में इस सीट पर मोदी लहर का असर नहीं दिखा। भाजपा प्रत्याशी रमाकांत यादव सपा के मुलायम सिंह यादव से हार गए। इस बार मुकाबला सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अौर भोजपुरी स्टार भाजपा प्रत्याशी दिनेश लाल यादव निरहुआ के बीच है।

हर चुनाव में यहां दलित, यादव व मुस्लिम मतदाता ही जीत हार का फैसला करते रहे हैं। आंकड़ों को देखें तो इसी यादव, दलित, मुस्लिम में से किसी दो के गठजोड़ को जो भी उम्मीदवार अपने पाले में करने में सफल रहा उसी के सिर जीत का सेहरा बंधा। आाजादी के बाद के दो चुनाव के बाद सीमांकन से आजमगढ़ नाम से संसदीय सीट बनी।

जातिगत समीकरण से ही 1962 से लगातार इस सीट पर या तो यादव प्रत्याशी विजयी हुआ या फिर उपविजेता रहा। कई बार तो ऐसा रहा कि यादव उम्मीदवार ही यादव से लड़ा। इस तगड़े जातिगत समीकरण का ही जलवा रहा कि 1962 से अब तक हुए 14 आम चुनाव अौर दो उपचुनाव में बारह बार यादव जाति के उम्मीदवारों ने अपना परचम लहराते हुए लोकसभा पहुंचे। तीन बार मुस्लिम प्रत्याशियों ने कामयाबी हासिल की।

कभी कोसल साम्राज्य का हिस्सा रहे आजमगढ़ को प्रशासनिक रूप से ब्रिटिश हुकूमत ने 1832 में जनपद बनाया। बेहद संवृद्ध व गौरवशाली इतिहास वाले जनपद की इस संसदीय क्षेत्र का राजनीतिक इतिहास भी कम ओजपूर्ण नहीं रहा है। 1994 में आजमगढ जिला मण्डल मुख्यालय घोषित हुआ।

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