इतिहास में व्यापक बदलाव करने की जरूरत, इतिहास को गलत ढंग से पेश किया गया : इंद्रेश कुमार, वरिष्ठ प्रचारक , संघ

संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार जी ने शनिवार को रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में समर्थन देने वाले दगाबाज हैं और अव्वल दर्जे के गद्दार हैं। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा डाला वह बिल्कुल सही है। इंद्रेश जी ने कहा कि भारत ने 23 देशों के लोगों को शरण दी है और भारत मानवाधिकार का सबसे बड़ा संरक्षक है। रोहिंग्या मुसलमानों का विरोध धर्म से संबंधित नहीं है बल्कि रोहिंग्या जरायम पेशा कबीले यानी की आपराधिक मानसिकता के लोग हैं। इन्होंने म्यांमार में जिस तरह का अत्याचार लोगों के साथ किया है वह विश्व में किसी से छुपा नहीं है। अब जब वहां की सरकार और लोगों ने इसका विरोध किया तो देश छोड़ कर भाग रहे हैं।

इनके नेतृत्व में गद्दार हंै। यह राष्ट्रविरोधी और शांति से रहने वाले लोग नहीं है। इंद्रेश कुमार जी इससे पहले शनिवार को ‘हाइफा विजय दिवस’ (23 सितम्बर) के उपलक्ष्य में नई दिल्ली के तीन मूर्ति चौक पर भारत देश के वीर जवानों की याद में पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। फोरम फॉर अर्वेनेंस ऑफ नेशनल सिक्यूरिटी (फेंस) तथा इंडो-इजराइल फ्रेंडशिप फोरम ने नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी में ‘विश्व शांति और इंडो-इजराइल मैत्री मंच’ के महत्व पर सेमिनार का आयोजन किया गया। इस मौके पर विदेश राज्यमंत्री जरनल वी.के. सिंह, गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर, आरएसएस के विश्व विभाग के संयुक्त संयोजक रवि कुमार अय्यर, राजस्थान अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन जसवीर सिंह, एनडीएमसी के चेयरमैन नरेश कुमार, फेंस के अध्यक्ष एयरमार्शल आर.सी. वाजपेई, इंडो-इजराइल के फ्रेंडशिप फोरम के अध्यक्ष रिटायर्ड जरनल आर.एन. सिंह तथा फोरम के महासचिव शिवाजी सरकार उपस्थित थे।

इतिहास में परिवर्तन की जरूरत… संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश जी का कहना है कि हमें अपने इतिहास में व्यापक बदलाव करने की जरूरत है। इतिहास को गलत ढंग से पेश किया गया है। बाबर और मोहम्मद गौरी जैसे शासक देश में जबतक रहे तब तक उन्होंने देश को सिर्फ लूटने का काम किया। यहां उन्होंने कोई अस्पताल, स्कूल या सड़क इत्यादि नहीं बनवाया। यहां तक की अकबर इस्लाम के खिलाफ खड़े थे। खुद को पैगम्बर बना लिया था। जबकि देश में चोल शासक, पल्लव, राजवाड़े आदि का वर्णन ठीक ढंग से नहीं किया गया है। इसलिए भारतीय इतिहास में परिवर्तन की जरूरत है।

क्या है ‘हाइफा विजय दिवस’… हाइफा का युद्ध 23 सितम्बर 1918 को लड़ा गया था। यह युद्ध प्रथम विश्व युद्ध के दौरान शांति के लिए सिनाई और फिलस्पीन के बीच चलाए जा रहे अभियान के अंतिम महीनों में इजराइल में लड़ा गया था। इस दिन भारतीय वीरों ने जर्मनी और तुर्कों की सेनाओं को हाइफा शहर से बाहर खदेड़ दिया था। इस युद्ध के हीरो मेजर दलपत सिंह शेखावत थे। प्रथम विश्व युद्ध के समय भारत की 3 रियासतों मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद के सैनिकों को अंग्रेजों की ओर से युद्ध के लिए तुर्की भेजा गया था। जहां उन्होंने जर्मनी के तोपों का सामना तलवारों और भालों से किया था।

राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) आर.के. सिंह ने कहा, “मुझे भारतीय सैनिकों पर गहरा सम्मान है, जिन्होंने WW-I के दौरान हैफा की मुक्ति के लिए अपनी ज़िंदगी बिछा दी “उन्होंने याद किया कि भारतीय सैनिकों ने कैसे प्रदर्शन किया था.
एक सफल कैवलरी प्रभार में अनुकरणीय कैवलरी कौशल और बहादुरी जो अंत में हाइफ़ा की मुक्ति से  समापन हुआ

श्री रवि कुमार, हिंदू स्वयंसेवक संघ (एचएसएस) और पुस्तक के लेखक हाइफ़ा, “इज़राइल में भारतीय वीरता” जो कि इंडो इजरायल फ्रेंडशिप के सलाहकार भी हैं फोरम ने भारत में ज्यूज़ के कई योगदानों पर प्रकाश डाला। उन्होंने साझा किया कि कैसे यहूदियों को भेदभाव जो की लगभग  ब्रिटेन, रूस, जर्मनी और इटली सहित विभिन्न देशों में व्याप्त था , लेकिन उन्होंने भारत में कभी इसका सामना नहीं किया भारत में रहनेवाले यहूदियों का उत्थान होने के बाद से वे बहुत आगे निकल गए हैं और वे वरिष्ठ पदों पर हैं।

प्रवेश खन्ना, राष्ट्रीय महाप्रबंधक प्रशंसकों ने धन्यवाद दिया।

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