सावरकर पर पुनर्विचार, कंस्टीट्यूशन क्लब में हुआ आयोजन

नई दिल्ली : स्वतंत्रता सेनानी और हिन्दू विचार धारा के राजनितिक विनायक दामोदर सावरकर के विचारों को राष्टीय मंच देने के लिए सावरकर पर पुनर्विचार कार्यक्रम का आयोजन किया गया. यह कार्यक्रम कंस्टीट्यूशन क्लब नई दिल्ली में सम्पन्न हुआ। आपको बता दें की कार्यक्रम के मुख्य वक्ता उदय माहूरकर मौजूद रहे और इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार उदय माहूरकर और मार्चिंग विद अ बिलियन के लेखक भी मौजद रहे। यह कार्यक्रम दिल्ली यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञानं के प्रोफेसर श्री प्रकाश सिंह की अध्यक्षता में हुआ । कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर और राष्टीय प्रमुख मुखपत्र और प्रकाशन विभाग भारतीय जनता पार्टी के शिव शक्ति नाथ बक्शी मौजूद रहे।कार्यक्रम की शुरुआत में वीर सावरकर के बारे में सभी वक्ताओं ने अपनी -अपनी बात रखी सावरकर क्या थे उनके बारे में क्या भ्रामक प्रचार किया गया। इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार उदय माहूरकर ने सावकर के बारे में कहा की सावरकर एक हिन्दू राष्टवादी राजनीतिक थे इस मौके पर उन्होंने कहा की यदि इंदिरा गांधी या पंडित जवाहर नेहरू जायदा समय तक जिंदा होते तो सावरकर की कुछ बातों को लेकर वह भी सहमत होते और कहा की सावरकर एक भविष्य वक्ता भी थे। उन्होंने कुछ बातों को लेकर चर्चा की कहा आज जो राष्ट्रवाद है और जो सावरकर का राष्ट्रवाद है उसमें जायदा फर्क नहीं कुछ उन्होंने कहा की सबसे बड़ा फर्क है इमोशन कंटेंट जो हम लोग फॉलो करते हैं। इस मौके पर उन्होंने हिंदुत्व को फॉलो करने वालों के ऊपर भी निशाना साधा कहा की आज जो लोग हिंदुत्व को फॉलो करते हैं। उन्हें हिंदुत्व के बारे में जायदा जानकारी ही नहीं कम से कम उन्हें हिंदुत्व के बारे में थोड़ा पढ़ने की जरूरत है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर ने कहा की हमारे देश में जो महापुरषों के साथ हो रहे अन्याय को दूर करने के लिए आये हैं। हमें पढ़ना होगा समझना होगा जब जाकर हम किसी नतीजे पर पहुंच सकते हैं। कार्यक्रम के अंत में सुधांशु त्रिवेदी ने कहा की वीर सावरकर एक अमर सेनानी के साथ -साथ भविष्य को भी अच्छा जानते थे। वीर सावकर ने समाज और देश को लेकर प्रखर उदार विचार प्रस्तुत किये हैं। इस लिए मैं मानता हूँ की आज 21 वी सदी चल रहा है हमारा देश आगे लगातार तरक्की कर रहा है। हम लोग 19 वी सदी और 20 सदी के मार्क्स का विचार उससे बाहर निकलकर ईमानदारी और तटस्था से आगे बढ़ना है।

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